
जब हम कृषि अनुसंधान की चर्चा करते हैं, तो हमारे सामने अनेक महत्वपूर्ण अनुसंधान संस्थानों के नाम आते हैं। इन्हीं में से एक है भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (Indian Veterinary Research Institute—IVRI), जिसका मुख्यालय वर्तमान में इज्जतनगर, बरेली, उत्तर प्रदेश में स्थित है।
कृषि और पशु चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए इस संस्थान का इतिहास जानना महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में कृषि एवं पशुपालन से जुड़े अनुसंधान संस्थानों की स्थापना, मुख्यालय और कार्यों से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
IVRI की स्थापना कैसे हुई?
19वीं शताब्दी में भारत में पशुओं में कई गंभीर संक्रामक रोग पाए जाते थे। पशुधन को इन रोगों से बचाने तथा पशु रोगों पर वैज्ञानिक अनुसंधान करने के उद्देश्य से एक विशेष प्रयोगशाला स्थापित करने की आवश्यकता महसूस हुई।
इसी दिशा में 9 दिसंबर 1889 को पुणे, महाराष्ट्र में Imperial Bacteriological Laboratory (IBL) की स्थापना की गई। यही प्रयोगशाला आगे चलकर भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान यानी IVRI बनी। संस्थान के आधिकारिक इतिहास के अनुसार डॉ. अल्फ्रेड लिंगार्ड को 1890 में इसका संस्थापक निदेशक नियुक्त किया गया।
1893 में मुक्तेश्वर स्थानांतरण
पुणे जैसे आबादी वाले क्षेत्र में अत्यधिक संक्रामक सूक्ष्मजीवों और रोगग्रस्त पशुओं से प्राप्त सामग्री पर अनुसंधान करना जोखिमपूर्ण माना गया। इसलिए प्रयोगशाला को एक अलग और सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्णय लिया गया।
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1893 में Imperial Bacteriological Laboratory को पुणे से मुक्तेश्वर, वर्तमान उत्तराखंड में स्थानांतरित कर दिया गया। पहाड़ी एवं अपेक्षाकृत अलग क्षेत्र होने के कारण मुक्तेश्वर संक्रामक पशु रोगों पर अनुसंधान के लिए उपयुक्त स्थान था।
इज्जतनगर, बरेली परिसर की स्थापना
यहाँ एक तथ्य विशेष रूप से याद रखना चाहिए—IVRI को 1893 में सीधे बरेली नहीं लाया गया था।
पहले यह पुणे से मुक्तेश्वर गया। इसके बाद 1913 में इज्जतनगर, बरेली में एक नया परिसर स्थापित किया गया, जिसका उद्देश्य बड़े स्तर पर सीरम और वैक्सीन का उत्पादन सहित संस्थान की गतिविधियों का विस्तार करना था।
IVRI नाम कैसे पड़ा?
संस्थान के नाम में समय-समय पर बदलाव हुए। 1925 में इसका नाम Imperial Institute of Veterinary Research किया गया। बाद के वर्षों में भी इसके नाम में परिवर्तन हुए और 1936 में यह Imperial Veterinary Research Institute बना।
भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में संस्थान का मुख्यालय मुक्तेश्वर से इज्जतनगर स्थानांतरित किया गया और इसका नाम Indian Veterinary Research Institute (IVRI) कर दिया गया।
ICAR के अंतर्गत कब आया?
1966 में IVRI का प्रशासनिक नियंत्रण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) को सौंप दिया गया और इसे राष्ट्रीय संस्थान के रूप में मान्यता मिली। वर्तमान में इसे ICAR-Indian Veterinary Research Institute (ICAR-IVRI) के नाम से जाना जाता है।
Deemed University का दर्जा
शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में संस्थान के बढ़ते योगदान को देखते हुए 16 नवंबर 1983 से UGC द्वारा IVRI को Deemed to be University का दर्जा प्रदान किया गया। इसके बाद Deemed University के रूप में इसका पहला शैक्षणिक सत्र 15 जनवरी 1985 को शुरू हुआ।
पशु रोग अनुसंधान में योगदान
IVRI ने पशुओं के स्वास्थ्य, रोगों की पहचान, रोकथाम और नियंत्रण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्थान के शुरुआती दौर में Rinderpest (पशु प्लेग) एक अत्यंत गंभीर बीमारी थी। IVRI में 1899 में anti-rinderpest serum का पहला बैच तैयार किया गया।
बाद में संस्थान ने Anthrax, Haemorrhagic Septicaemia, Tetanus तथा Black Quarter जैसे पशु रोगों के नियंत्रण से संबंधित जैविक उत्पादों और तकनीकों पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया। आज संस्थान पशु एवं कुक्कुट रोगों की diagnosis, prevention और control के साथ-साथ पशुधन उत्पादन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान करता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
स्थापना: 9 दिसंबर 1889
प्रारंभिक नाम: Imperial Bacteriological Laboratory (IBL)
स्थापना स्थान: पुणे, महाराष्ट्र
संस्थापक निदेशक: डॉ. अल्फ्रेड लिंगार्ड
मुक्तेश्वर स्थानांतरण: 1893
इज्जतनगर परिसर की स्थापना: 1913
मुख्यालय इज्जतनगर स्थानांतरित: 1947
वर्तमान नाम: Indian Veterinary Research Institute (IVRI)
ICAR के प्रशासनिक नियंत्रण में: 1966
Deemed University का दर्जा: 1983
वर्तमान मुख्यालय: इज्जतनगर, बरेली, उत्तर प्रदेश
इस प्रकार 1889 में पुणे से शुरू हुई एक छोटी पशु रोग अनुसंधान प्रयोगशाला आज ICAR-IVRI के रूप में भारत के प्रमुख पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान अनुसंधान और शिक्षण संस्थानों में से एक है। इसका इतिहास भारत में आधुनिक पशु चिकित्सा अनुसंधान के विकास को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
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