उत्तराखंड में कृषि का इतिहास, योजनाएं, नीतियां एवं कृषि की पूरी जानकारी
नमस्कार दोस्तों, ब्रिटिश काल के समय से ही उत्तराखंड में कृषि से संबंधित कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाने लगे थे। समय के साथ कृषि के विकास के लिए कई विभागों की स्थापना हुई, नई-नई योजनाएं और नीतियां लागू की गईं। आज हम आपको उत्तराखंड में कृषि के इतिहास से लेकर वर्तमान योजनाओं तक की पूरी जानकारी देंगे। इसलिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

उत्तराखंड में कृषि का इतिहास
साल 1871 में लॉर्ड मेयो के समय कृषि को राजस्व, कृषि एवं वाणिज्य विभाग से जोड़ा गया।
कृषि प्रशासन का औपचारिक विकास ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ। 1875 में भारत में कृषि विभाग की स्थापना की गई।
16 जुलाई 1929 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की स्थापना की गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत की मिट्टी को आठ प्रमुख वर्गों में विभाजित किया।
वर्ष 2003 में पंतनगर में उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद (UBCOST) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य कृषि जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान, नई तकनीकों का विकास तथा पौधों की उन्नत किस्में विकसित करना है।
उत्तराखंड ऑर्गेनिक कमोडिटी बोर्ड की स्थापना 2003 में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए की गई।
उत्तराखंड स्टेट सीड एंड ऑर्गेनिक प्रोडक्शन सर्टिफिकेशन एजेंसी (USSOPCA) की स्थापना 14 मार्च 2002 को किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज एवं जैविक प्रमाणन उपलब्ध कराने के लिए की गई।
8 जून 2006 को देहरादून में उत्तराखंड ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी की शुरुआत हुई। इसका कार्य जैविक उत्पादों का प्रमाणन करना है।
कृषि उत्पादन मंडी परिषद का गठन राज्य बनने के बाद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से किया गया।
उत्तराखंड की कृषि नीतियां
राज्य की पहली कृषि नीति 2011 में लागू की गई।
दूसरी कृषि नीति 2018 में लागू हुई। इसका उद्देश्य जैविक खेती को बढ़ावा देना, कृषि उत्पादकता बढ़ाना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है।
उत्तराखंड जैविक कृषि अधिनियम को 2019 में मंजूरी मिली तथा जनवरी 2020 से इसे लागू किया गया। इसका उद्देश्य रासायनिक खेती को कम करना, जैविक खेती को बढ़ावा देना तथा पर्यावरण संरक्षण करना है।
उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने कृषि भूमि को पट्टे पर देने की व्यवस्था लागू की, जिससे कृषि निवेश और उत्पादन को बढ़ावा मिला।
कृषि एवं ग्रामीण विकास
उत्तराखंड विकेंद्रीकृत वाटरशेड विकास परियोजना का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों में मृदा संरक्षण, जल संरक्षण तथा पर्यावरण संरक्षण करना है।
राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में मुख्य रूप से परिवार की आवश्यकताओं के लिए खेती की जाती है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में व्यावसायिक खेती अधिक होती है।
राज्य की लगभग 69.77 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और अधिकांश लोग कृषि पर निर्भर हैं।
2015-16 के कृषि आंकड़ों के अनुसार कुल जोतों की संख्या लगभग 8.81 लाख है तथा औसत जोत का आकार लगभग 0.847 हेक्टेयर है। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य में सीमांत एवं लघु किसानों की संख्या अधिक है।
- उत्तराखंड में कृषि नीतियां
- कृषि छात्र कैसे शुरू कर सकते हैं औद्योगिक भांग (Industrial Hemp) का व्यवसाय? जानिए लाइसेंस, नियम और अवसर
- कृषि छात्र फर्टिलाइजर की दुकान कैसे खोलें? जानिए लाइसेंस लेने की पूरी प्रक्रिया
- 2024-25 में भारत का कृषि उत्पादन कितना रहा? जानिए पूरी जानकारी
- NIPU-2026 क्या होता है और जरूरत क्यों पड़ी।
कृषि पद्धति एवं मिट्टी
उत्तराखंड में फसल चक्र (Crop Rotation) अपनाया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
पर्वतीय मिट्टी का pH लगभग 5.5 से 6.5 के बीच होता है।
राज्य में जलोढ़ मिट्टी, लाल मिट्टी, दोमट मिट्टी, शिवालिक मिट्टी तथा तराई की मिट्टी प्रमुख रूप से पाई जाती हैं।
उत्तराखंड में सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming), कंटूर फार्मिंग तथा कुछ क्षेत्रों में झूम खेती भी की जाती है।
बागवानी
फल उत्पादन में उत्तरकाशी का प्रमुख स्थान है। इसके बाद नैनीताल, देहरादून और चमोली का स्थान आता है।
उत्तरकाशी के हर्षिल में राज्य का पहला प्रमुख सेब बाग विकसित किया गया।
मिशन एप्पल के माध्यम से सेब उत्पादन बढ़ाने तथा माइक्रो सिंचाई तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है।
देहरादून की लीची को भौगोलिक पहचान (GI Tag) प्राप्त है तथा यह देश-विदेश में प्रसिद्ध है।
अखरोट उत्पादन बढ़ाने के लिए वॉलनट मिशन संचालित किया जा रहा है।
कीवी को हाई वैल्यू फसल के रूप में विकसित किया जा रहा है।
सब्जी, मशरूम एवं चाय
मैदानी क्षेत्रों में आलू तथा पर्वतीय क्षेत्रों में विभिन्न सब्जियों का उत्पादन किया जाता है।
मशरूम उत्पादन के लिए ज्योलीकोट, भवाली तथा सहसपुर प्रमुख क्षेत्र हैं।
उत्तराखंड में चाय की खेती का इतिहास वर्ष 1830 से माना जाता है। राज्य गठन के बाद उत्तरांचल टी डेवलपमेंट बोर्ड का गठन किया गया।
भीमताल, भवाली, कोटाबाग आदि क्षेत्र चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
कृषि आंदोलन
नवधान्य आंदोलन – डॉ. वंदना शिवा द्वारा प्रारंभ, जिसका उद्देश्य पारंपरिक बीजों का संरक्षण एवं जैविक खेती को बढ़ावा देना है।
बीज बचाओ आंदोलन – विजय जड़धारी द्वारा शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य पारंपरिक बीजों और जैव विविधता का संरक्षण करना है।
बीज बम अभियान – द्वारिका प्रसाद सेमवाल द्वारा चलाया गया, जिसका उद्देश्य पौधारोपण और हरित क्षेत्र बढ़ाना है।
प्रमुख योजनाएं
- किसान रत्न सम्मान योजना (2010)
- मुख्यमंत्री संरक्षित उद्यान विकास योजना (पॉलीहाउस निर्माण हेतु सहायता)
- किसान क्रेडिट कार्ड योजना (1998)
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (24 फरवरी 2019 से लागू)
- प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (2019)
- राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA)
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (2015)
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY)
- हिमालयन बास्केट योजना
- राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) – 2016
- मुख्यमंत्री एकीकृत बागवानी विकास योजना
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना – “पर ड्रॉप मोर क्रॉप”
- मोबाइल वेटरनरी यूनिट योजना (2022, हेल्पलाइन 1962)
- महिला डेयरी विकास योजना
- गंगा गाय महिला डेयरी योजना
- कुक्कुट विकास योजना
- नेशनल लाइवस्टॉक मिशन
सिंचाई
उत्तराखंड में लगभग 48.8 प्रतिशत कृषि भूमि सिंचित है। पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचाई कम तथा मैदानी क्षेत्रों में अधिक होती है।
उधम सिंह नगर में सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र है, जबकि अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में सबसे कम सिंचित क्षेत्र पाया जाता है।
जहां पानी की कमी होती है वहां ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उत्तराखंड की सबसे पुरानी प्रमुख नहर ऊपरी गंगा नहर मानी जाती है।
निष्कर्ष
उम्मीद करता हूं कि हमारे द्वारा दी गई यह जानकारी आपको पसंद आई होगी। यदि आपका कोई सवाल या सुझाव है तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं। यदि आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।

