नमस्कार साथियों,
जब हम हरित क्रांति के बारे में सुनते हैं या पढ़ते हैं, तो हमारे मन में सबसे पहले अधिक उत्पादन, उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग, सिंचाई का विस्तार और आधुनिक कृषि तकनीकों का विचार आता है। लेकिन हरित क्रांति का मतलब केवल अधिक खाद डालना नहीं था, बल्कि वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से कम भूमि पर अधिक उत्पादन प्राप्त करना था।

हरित क्रांति की शुरुआत
PL-480 कार्यक्रम क्या था?
उस समय अमेरिका द्वारा PL-480 (Public Law 480) कार्यक्रम चलाया जा रहा था। इसके अंतर्गत खाद्यान्न की कमी वाले देशों को गेहूं और अन्य अनाज उपलब्ध कराए जाते थे, जिनमें भारत भी शामिल था। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका ने खाद्यान्न आपूर्ति पर दबाव बनाया, जिससे भारत ने आत्मनिर्भर बनने का संकल्प और मजबूत किया। इसी समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया और देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की।
हरित क्रांति का प्रभाव
धीरे-धीरे भारत में गेहूं और धान का उत्पादन तेजी से बढ़ने लगा। 1971 के बाद भारत की खाद्यान्न स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गई और देश PL-480 पर निर्भरता से बाहर निकलने लगा।
अगर बात करें “हरित क्रांति” शब्द की, तो इसका प्रयोग सबसे पहले विलियम एस. गॉड (William S. Gaud) ने 1968 में अपने एक भाषण में किया था।
भारत में कृषि शिक्षा और ICAR
भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर है, जिसकी स्थापना 1960 में हुई। आज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के मार्गदर्शन में 79 कृषि विश्वविद्यालय और 731 कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचा रहे हैं।
हरित क्रांति की सफलता के पीछे केवल उन्नत बीज ही नहीं, बल्कि सिंचाई का विस्तार, रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग, कीटनाशकों का प्रयोग, कृषि मशीनरी और सरकार की नीतियों का भी बड़ा योगदान रहा। इसी कारण भारत आज खाद्यान्न उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है।
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