नमस्कार साथियों,
जब हम कृषि या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP (Minimum Support Price) के बारे में अक्सर सवाल पूछा जाता है। MSP क्या है, सरकार इसे क्यों घोषित करती है और क्या देश का हर किसान अपनी फसल MSP पर बेच पाता है—इन सभी बातों को समझना जरूरी है।
MSP क्या है?
MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह मूल्य है जिसे सरकार प्रमुख कृषि फसलों के लिए पहले से घोषित करती है। इसका उद्देश्य किसानों को उनकी उपज के लिए एक समर्थन मूल्य उपलब्ध कराना है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात समझनी जरूरी है—MSP घोषित होना और किसान द्वारा वास्तव में MSP पर अपनी फसल बेचना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

रबी फसलों की MSP
रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए सरकार ने छह प्रमुख रबी फसलों की MSP में वृद्धि की है। इनमें गेहूँ, जौ, चना, मसूर, रेपसीड एवं सरसों और कुसुम शामिल हैं।
इनकी MSP इस प्रकार है:
- गेहूँ — ₹2,610 प्रति क्विंटल
- जौ — ₹2,286 प्रति क्विंटल
- चना — ₹5,958 प्रति क्विंटल
- मसूर — ₹7,390 प्रति क्विंटल
- रेपसीड एवं सरसों — ₹6,613 प्रति क्विंटल
- कुसुम — ₹7,215 प्रति क्विंटल
इनमें कुसुम की MSP में सबसे अधिक ₹675 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।
क्या हर किसान MSP पर अपनी फसल बेच पाता है?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या देश का हर किसान अपनी फसल MSP पर बेच पाता है?
नहीं, ऐसा नहीं है कि हर किसान अपनी पूरी उपज MSP पर सरकारी एजेंसी को बेचता है।

किसान MSP पर अपनी उपज तब बेचता है जब संबंधित फसल के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था उपलब्ध हो और उसकी उपज निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप हो।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्या है? MSP कैसे तय किया जाता है? (2026-27)
सरकार ने 6 फरवरी 2026 को राज्यसभा में दिए गए उत्तर में बताया कि सरकारी खरीद एजेंसियों के माध्यम से MSP पर उपज बेचने वाले किसानों का आंकड़ा रखा जाता है।
15% धान और 9.6% गेहूँ का आंकड़ा क्या है?
MSP की चर्चा में अक्सर यह आंकड़ा सामने आता है कि 15 प्रतिशत धान किसानों और 9.6 प्रतिशत गेहूँ किसानों ने MSP पर अपनी उपज बेची।
लेकिन इसे सही संदर्भ में समझना बहुत जरूरी है।
सरकार के अनुसार यह आंकड़ा 2018-19 के Situation Assessment of Agricultural Households Survey से संबंधित है। बिक्री की सूचना देने वाले किसानों में लगभग 15% धान किसानों और 9.6% गेहूँ किसानों ने अपनी उपज खरीद एजेंसियों को बेची थी।
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वर्तमान समय में केवल 15% धान किसान और 9.6% गेहूँ किसान ही MSP का लाभ लेते हैं। ये आंकड़े 2018-19 के सर्वेक्षण से संबंधित हैं।
सरकार ने 2026 के अपने जवाब में यह भी बताया कि पिछले वर्षों में MSP से लाभान्वित किसानों का अनुपात बेहतर हुआ है।
इसे आसान उदाहरण से समझिए
मान लीजिए किसी कॉलेज में 100 छात्रों के लिए कोई सुविधा उपलब्ध है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर दिन सभी 100 छात्र उस सुविधा का इस्तेमाल करेंगे।
ठीक इसी तरह:
MSP घोषित होना → सरकार ने फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया।
MSP पर सरकारी खरीद → किसान वास्तव में अपनी निर्धारित गुणवत्ता वाली फसल सरकारी खरीद एजेंसी को MSP पर बेचता है।
इसलिए MSP और सरकारी खरीद को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए।
पिछले वर्षों में MSP पर फसल बेचने वाले किसान
सरकार द्वारा राज्यसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, धान और गेहूँ के लिए MSP पर उपज बेचने वाले किसानों की संख्या इस प्रकार रही:
धान
2020-21 — 1,31,12,458 किसान
2021-22 — 1,26,79,650 किसान
2022-23 — 1,24,97,077 किसान
2023-24 — 1,06,58,233 किसान
2024-25 — 1,18,58,507 किसान
2025-26 — 95,58,018 किसान
गेहूँ
2020-21 — 43,35,972 किसान
2021-22 — 49,19,891 किसान
2022-23 — 17,83,192 किसान
2023-24 — 21,34,458 किसान
2024-25 — 22,48,725 किसान
2025-26 — 25,13,143 किसान
निष्कर्ष
MSP को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि सरकार ने किसी फसल की MSP कितनी घोषित की है। हमें यह भी समझना चाहिए कि वास्तव में कितने किसान सरकारी खरीद व्यवस्था के माध्यम से MSP पर अपनी उपज बेच रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 15% धान और 9.6% गेहूँ का आंकड़ा 2018-19 के सर्वेक्षण से संबंधित है, इसे वर्तमान 2026-27 का प्रतिशत नहीं माना जाना चाहिए।
इसलिए जब भी MSP के बारे में पढ़ें या परीक्षा में इसका सवाल आए, तो MSP की घोषणा, सरकारी खरीद और MSP पर वास्तविक रूप से उपज बेचने वाले किसानों—इन तीनों को अलग-अलग समझें।

