साथियों, जब से मानव इतिहास की शुरुआत हुई है, तभी से व्यापार की भी शुरुआत हुई है। पहले लोग वस्तु के बदले वस्तु का लेन-देन करते थे, जिसे बार्टर सिस्टम कहा जाता था। बाद में पैसे के माध्यम से व्यापार होने लगा। किसी भी देश के विकास के लिए व्यापार बहुत जरूरी होता है।

आज विश्व में व्यापार को नियंत्रित करने वाली एक संस्था है, जिसका नाम है वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO)। आपके मन में भी यह सवाल आता होगा कि WTO क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई, इसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी और यह क्या काम करता है। आज हम इन्हीं सवालों के जवाब जानेंगे।
WTO एक ऐसा संगठन है जिसमें वर्तमान में 164 देश सदस्य हैं। यह देशों के बीच व्यापार के नियम बनाता है और उन्हें लागू करवाता है। इसका मुख्य उद्देश्य विश्व व्यापार को स्वतंत्र, सुव्यवस्थित और सुचारू रूप से आगे बढ़ाना है। यह देशों के बीच व्यापार समझौतों पर बातचीत के लिए एक मंच भी प्रदान करता है।
WTO अंतरराष्ट्रीय व्यापार में वस्तुओं (Products), सेवाओं (Services) और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) को नियंत्रित करता है और सदस्य देशों के बीच विवादों को सुलझाने में मदद करता है।
महामंदी (Great Depression) और व्यापार संकट
1930 के दशक में दुनिया ने एक बड़ी आर्थिक मंदी का सामना किया, जिसे ग्रेट डिप्रेशन कहा जाता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अधिकतर देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संरक्षणवाद (Protectionism) की नीति अपनाई।
इस नीति के तहत आयात पर भारी टैक्स (टैरिफ) लगाया गया। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार कम हो गया।
सितंबर 1929 में अमेरिका में शेयर बाजार गिरना शुरू हुआ और 29 अक्टूबर 1929 को एक बड़ा स्टॉक मार्केट क्रैश हुआ, जिसे ब्लैक ट्यूसडे कहा जाता है। यहीं से महामंदी की शुरुआत मानी जाती है।
इस मंदी के दौरान:
- लाखों लोग बेरोजगार हो गए
- हजारों बैंक बंद हो गए
- लोगों की जमा पूंजी खत्म हो गई
- गरीबी तेजी से बढ़ी
1929 से 1932 के बीच विश्व GDP में लगभग 27% की गिरावट आई। यह इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक गिरावट थी।
स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट (1930)
महामंदी से बचने के लिए अमेरिका ने 1930 में Smoot-Hawley Tariff Act लागू किया। इसके तहत आयात पर बहुत अधिक टैक्स लगाया गया।
अमेरिका को देखकर ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों ने भी यही नीति अपनाई। इससे विश्व व्यापार में 40% से 60% तक गिरावट आ गई।
इस नीति ने आर्थिक संकट को और बढ़ा दिया और आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि भी तैयार की।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (1944)
दुनिया को इस स्थिति से बचाने के लिए 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स शहर में एक सम्मेलन हुआ, जिसे Bretton Woods Conference कहा जाता है।
यह सम्मेलन 1 जुलाई से 22 जुलाई 1944 तक चला।
इसमें यह तय किया गया कि भविष्य में ऐसी मंदी न आए, इसके लिए एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था बनाई जाए।
इस सम्मेलन में तीन संस्थाएं प्रस्तावित की गईं:
- IMF (International Monetary Fund)
- IBRD (World Bank)
- ITO (International Trade Organization)
IMF और World Bank बन गए, लेकिन ITO सफल नहीं हो पाया।
ITO क्यों असफल हुआ?
1948 में ITO के लिए Havana Charter तैयार किया गया। इसमें व्यापार, निवेश और रोजगार से जुड़े नियम थे।
इसे लागू करने के लिए 56 देशों के हस्ताक्षर जरूरी थे, लेकिन अमेरिका ने इसे मंजूरी नहीं दी। अमेरिका के मना करने से बाकी देश भी पीछे हट गए और ITO असफल हो गया।
GATT का गठन (1947)
ITO के असफल होने के बाद देशों ने एक अस्थायी समाधान निकाला।
1947 में जिनेवा में GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) बनाया गया।
इस पर 23 देशों ने हस्ताक्षर किए और 1 जनवरी 1948 से यह लागू हुआ।
GATT का उद्देश्य था:
- आयात शुल्क कम करना
- व्यापार को बढ़ावा देना
- कोटा प्रणाली खत्म करना
GATT सिर्फ वस्तुओं के व्यापार पर लागू था और यह कोई संगठन नहीं था, बल्कि केवल एक समझौता था।
WTO का गठन (1995)
GATT में कई कमियां थीं:
- यह स्थायी संगठन नहीं था
- इसका कोई मजबूत ढांचा नहीं था
- विवाद समाधान प्रणाली कमजोर थी
इसीलिए 1986 में Uruguay Round शुरू हुआ। कई वर्षों की बातचीत के बाद 15 अप्रैल 1994 को समझौता हुआ।
इसके तहत:
1 जनवरी 1995 को WTO की स्थापना हुई।
इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में है।
WTO क्यों बनाया गया?
WTO बनाने के मुख्य कारण:
- मजबूत संस्था की जरूरत
- विवाद सुलझाने की व्यवस्था
- सेवाओं और बौद्धिक संपदा को शामिल करना
- वैश्विक व्यापार को नियमों में बांधना
- पारदर्शिता बढ़ाना
WTO के पास अपना स्वतंत्र सचिवालय और स्थायी ढांचा है, जो इसे GATT से अलग बनाता है।
निष्कर्ष
विश्व व्यापार संगठन (WTO) आज विश्व व्यापार की रीढ़ है। यह देशों को निष्पक्ष व्यापार करने का अवसर देता है और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।
महामंदी, संरक्षणवाद और युद्धों से मिले अनुभवों के बाद दुनिया ने समझा कि व्यापार को नियमों के तहत चलाना जरूरी है। इसी सोच से WTO का जन्म हुआ।
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