अक्सर जब हम जीएम (Genetically Modified) फसलों की बात करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि आज भारत और विश्व में कृषि के क्षेत्र में लगातार नई-नई तकनीकें आ रही हैं। इन तकनीकों का उपयोग हम बड़े स्तर पर कर भी रहे हैं।

अगर भारत की बात करें, तो वर्तमान में केवल Bt कपास (Cotton) को ही आधिकारिक रूप से उगाने की अनुमति दी गई है। वहीं अन्य फसलों जैसे बीटी बैंगन (Bt Brinjal) पर शोध हुआ, लेकिन उसे व्यावसायिक रूप से अनुमति नहीं मिली।
विश्व स्तर पर देखें तो अमेरिका जीएम फसलों के उत्पादन में नंबर एक देश है।

जीएम का अर्थ होता है किसी जीव के जीन (DNA) में बदलाव करके उसमें नई विशेषताएं जोड़ना। यह तकनीक कई बार लाभदायक होती है, लेकिन इसके कुछ जोखिम भी हो सकते हैं, इसलिए सावधानी जरूरी है
साल 2001 में अमेरिका में एक रिसर्च की गई, जिसमें एक बंदर (Anty) के जीन में जेलीफिश का जीन डाला गया। इसका उद्देश्य यह देखना था कि जेनेटिक मॉडिफिकेशन संभव है या नहीं। बंदर सामान्य रूप से पैदा हुआ, लेकिन उसके अंदर जीन परिवर्तन मौजूद था।
यह शोध यह साबित करता है कि प्राइमेट्स (बंदरों) में भी जेनेटिक बदलाव संभव है, हालांकि अपेक्षित परिणाम पूरी तरह नहीं मिले।

वहीं भारत में आलू पर भी नए प्रयोग किए जा रहे हैं। आगरा में स्थापित संस्थान में आलू में आयरन (Iron) बढ़ाने की तकनीक विकसित की जा रही है, ताकि आयरन की कमी से होने वाली बीमारियों को कम किया जा सके।
GM फसल क्या होती है और भारत में कौन-सी GM फसल उगाई जाती है?
उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में आलू की खेती के लिए अनुकूल मौसम पाया जाता है, इसलिए इस तकनीक का सीधा लाभ किसानों और लोगों को मिल सकता है।
निष्कर्ष
जीएम फसलें और नई तकनीकें कृषि क्षेत्र में क्रांति ला सकती हैं, लेकिन इनके साथ जुड़े जोखिमों को समझना भी जरूरी है। हमें विज्ञान का उपयोग संतुलन और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।

