नमस्कार आज बात करते हैं कृषि की। भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ लगभग 60% लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह बहुत जरूरी हो जाता है कि हमारे युवाओं को कृषि से जुड़ी सही जानकारी, स्किल और प्रैक्टिकल ज्ञान मिले, ताकि वे सिर्फ पारंपरिक खेती ही नहीं बल्कि आधुनिक तकनीकों के साथ आगे बढ़ सकें।

इसी उद्देश्य से देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कृषि से जुड़े कोर्स चलाए जाते हैं, जहाँ छात्रों को खेती, रिसर्च, नई तकनीक, फसल उत्पादन, मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि प्रबंधन जैसी चीजें सिखाई जाती हैं।
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इन कोर्सों की निगरानी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के द्वारा की जाती है। यानी जो विश्वविद्यालय ICAR से एफिलिएटेड होते हैं, वे एक तय मानक के अनुसार शिक्षा देते हैं और छात्रों को बेहतर ट्रेनिंग और एक्सपोजर मिलता है।
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लेकिन आज के समय में एक बड़ी समस्या देखने को मिल रही है। देश में तेजी से कई निजी विश्वविद्यालय खुल रहे हैं जो ICAR से एफिलिएटेड नहीं हैं, फिर भी वे कृषि से जुड़े कोर्स चला रहे हैं।
शुरुआत में ये विश्वविद्यालय बड़े-बड़े वादे करते हैं—अच्छी प्लेसमेंट, मॉडर्न लैब, बेहतर फैकल्टी—लेकिन जब छात्र वहाँ पढ़ाई शुरू करता है तो उसे हकीकत का पता चलता है।
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ऐसे संस्थानों में कई बार न तो पर्याप्त लैब होती है, न फील्ड ट्रेनिंग की सही व्यवस्था होती है और न ही अनुभवी शिक्षक मिल पाते हैं।
कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सिर्फ किताबों से काम नहीं चलता, यहाँ प्रैक्टिकल ज्ञान सबसे ज्यादा जरूरी होता है। लेकिन इन निजी विश्वविद्यालयों में छात्रों को वह अनुभव नहीं मिल पाता, जिससे उनका भविष्य प्रभावित होता है
- अभी कुछ समय पहले गुजरात में ऐसे कई विश्वविद्यालयों पर कार्रवाई की गई जो ICAR के नियमों का पालन नहीं कर रहे थे और उन्हें बंद कर दिया गया।
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- यह कदम छात्रों के हित में बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह संदेश गया कि शिक्षा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। इसी तरह की सख्ती देश के अन्य राज्यों में भी होनी चाहिए।
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- एक और बड़ी समस्या फीस को लेकर है। कई प्राइवेट विश्वविद्यालय हर साल फीस बढ़ाते रहते हैं, जिससे सामान्य परिवार के छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जाता है। परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज तक ले लेते हैं, लेकिन अंत में जब शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी नहीं मिलती और नौकरी के अवसर भी सीमित होते हैं, तो यह एक बड़ी समस्या बन जाती है।
आज जरूरत है कि छात्र और उनके अभिभावक एडमिशन लेने से पहले पूरी जानकारी लें
क्या विश्वविद्यालय ICAR से मान्यता प्राप्त है या नहीं, वहाँ की सुविधाएँ कैसी हैं, प्लेसमेंट का रिकॉर्ड क्या है, और पिछले छात्रों का अनुभव कैसा रहा है। सिर्फ विज्ञापन देखकर या किसी के कहने पर निर्णय लेना सही नहीं है।
सरकार और संबंधित संस्थाओं को भी इस दिशा में और सख्त कदम उठाने चाहिए ताकि कोई भी संस्थान बिना मान्यता के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न कर सके। साथ ही कृषि शिक्षा को और ज्यादा प्रैक्टिकल, टेक्नोलॉजी आधारित और रोजगार उन्मुख बनाया जाना चाहिए।
अंत में यही कहा जा सकता है कि अगर हमें भारत की कृषि को आगे बढ़ाना है तो सबसे पहले हमें कृषि शिक्षा को मजबूत बनाना होगा। जब हमारे युवा सही ज्ञान और स्किल के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी देश की खेती भी आगे बढ़ेगी और किसान भी आत्मनिर्भर बन पाएंगे।
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निष्कर्ष
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