• February 2, 2026 6:59 pm

    26 साल में किसानों को ₹111 लाख करोड़ का नुकसान, क्यों नहीं सुनी जाती अन्नदाता की आवाज़?

    भारत को हमेशा से खेती प्रधान देश कहा जाता रहा है। हमारे देश की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। गाँव-गाँव में किसान दिन-रात मेहनत करके देश के लिए अनाज उगाता है। स्कूलों और कॉलेजों में कृषि से जुड़े कोर्स पढ़ाए जाते हैं। सरकार भी बार-बार किसानों को देश की रीढ़ बताती है। लेकिन जब हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई, तो उसने इस पूरी तस्वीर पर सवाल खड़े कर दिए।

    इस रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 से 2026 तक भारतीय किसानों को लगभग ₹111 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। यह नुकसान इतना बड़ा है कि इससे पूरे देश का विकास कई गुना तेज हो सकता था। लेकिन यह पैसा किसानों के हाथ में नहीं आया।

    सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? किसान इतना नुकसान क्यों झेल रहा है? और सरकार व समाज इस पर चुप क्यों हैं?


    रिपोर्ट ने खोली किसानों की असली हालत


    कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के अनुसार, यह आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय संस्था OECD की रिपोर्ट पर आधारित है। OECD ने किसानों की आमदनी और बाजार कीमतों का विश्लेषण किया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर भारतीय किसानों को उनकी फसल का अंतरराष्ट्रीय बाजार के बराबर सही दाम मिलता, तो वे बहुत अच्छी कमाई कर सकते थे।


    लेकिन हकीकत यह है कि किसान को अक्सर उसकी फसल का पूरा दाम नहीं मिलता। उसकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता। इसी वजह से साल-दर-साल किसान नुकसान में चलता गया और 26 साल में यह नुकसान ₹111 लाख करोड़ तक पहुँच गया।
    खेती का खर्च बढ़ता गया, कमाई घटती गई
    आज खेती करना पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो गया है।

    पहले किसान अपने बीज खुद बचा लेता था, खाद खुद बना लेता था और बैलों से खेती करता था। लेकिन अब सब कुछ बाजार से खरीदना पड़ता है।
    खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल, बिजली, पानी और मजदूरी—सब कुछ महंगा हो गया है।

    पिछले 20-25 सालों में इन चीजों की कीमत कई गुना बढ़ चुकी है। लेकिन इसके मुकाबले फसलों के दाम उतनी तेजी से नहीं बढ़े।


    कई बार ऐसा होता है कि किसान जितना खर्च करता है, उतनी कमाई भी नहीं हो पाती। ऐसे में उसे घाटा उठाना पड़ता है। धीरे-धीरे किसान कर्ज में फँसता चला जाता है।


    सही दाम न मिलना सबसे बड़ी समस्या


    किसान की सबसे बड़ी समस्या है—उसे उसकी फसल का सही दाम नहीं मिलना। जब फसल तैयार होती है, तो किसान मजबूरी में उसे सस्ते दाम पर बेच देता है।
    क्योंकि उसके पास भंडारण की सुविधा नहीं होतीउसे तुरंत पैसे की जरूरत होती हैबाजार में व्यापारी कम दाम देते हैं


    सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करती है, लेकिन हर जगह किसान को MSP नहीं मिल पाता। कई किसान खुले बाजार में फसल बेचने को मजबूर होते हैं, जहाँ दाम बहुत कम मिलते हैं।बिचौलियों का खेल, किसान का नुकसानखेती से जुड़ी व्यवस्था में सबसे बड़ा नुकसान बिचौलियों की वजह से होता है। किसान सीधे ग्राहक तक अपनी फसल नहीं पहुँचा पाता। उसके बीच कई लोग आ जाते हैं—दलाल, व्यापारी, थोक विक्रेता और दुकानदार।

    ये सभी लोग अपना मुनाफा जोड़ लेते हैं। नतीजा यह होता है कि किसान को बहुत कम पैसा मिलता है और वही फसल शहरों में महंगे दाम पर बिकती है।
    एक रिपोर्ट के अनुसार, किसान को अपनी फसल की असली कीमत का केवल 15 से 20 प्रतिशत ही मिल पाता है। बाकी पैसा बीच के लोग कमा लेते हैं


    कर्ज का जाल और मानसिक तनाव


    जब किसान की कमाई कम होती है और खर्च ज्यादा होता है, तो वह कर्ज लेने को मजबूर हो जाता है। पहले वह बैंक से लोन लेता है। फिर साहूकार से उधार लेता है। धीरे-धीरे वह कर्ज के जाल में फँस जाता है।
    कर्ज चुकाने का दबाव, फसल खराब होने का डर, मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितता—ये सब मिलकर किसान को मानसिक तनाव में डाल देते हैं।
    इसी तनाव की वजह से कई किसान गलत कदम उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। यह हमारे समाज के लिए बहुत दुखद स्थिति है।


    ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर


    किसान जब कमजोर होता है, तो इसका असर पूरे गाँव पर पड़ता है। जब किसान के पास पैसा नहीं होता, तो वह कम खरीदारी करता है। कपड़े, मोबाइल, मोटरसाइकिल, खाद्य सामग्री—सबकी बिक्री कम हो जाती है।


    इससे गाँवों की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। छोटे दुकानदार, मजदूर और व्यापारी भी प्रभावित होते हैं। धीरे-धीरे पूरे इलाके में आर्थिक सुस्ती आ जाती है।
    युवा पीढ़ी का खेती से मोहभंग आज गाँव के युवा खेती से दूर भाग रहे हैं। वे देखते हैं कि उनके माता-पिता दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी गरीबी में जीते हैं। इसलिए वे खेती को भविष्य नहीं मानते।
    युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वे छोटी-मोटी नौकरी करने लगते हैं। इससे खेती में मजदूरों की कमी हो रही है और खेती और महंगी होती जा रही है।
    सरकार की योजनाएँ: काफी हैं या नहीं?


    सरकार ने किसानों के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं, जैसे—


    PM-KISAN योजन


    फसल बीमा योजना


    किसान क्रेडिट कार्ड


    सब्सिडी योजनाएँ


    इन योजनाओं से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह काफी नहीं है। महंगाई के मुकाबले यह मदद बहुत कम है।


    PM-KISAN में मिलने वाली राशि आज के समय में किसानों की जरूरतों के हिसाब से बहुत कम है।


    समाधान क्या हो सकता है?


    विशेषज्ञों का मानना है कि अब किसानों के लिए मजबूत और स्थायी व्यवस्था बनानी होगी।

    1. MSP की कानूनी गारंटी
      किसान को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसे उसकी फसल का न्यूनतम तय दाम जरूर मिलेगा।
    2. सीधी आय सहायता बढ़ाना
      PM-KISAN जैसी योजनाओं की राशि बढ़ाई जानी चाहिए और समय पर दी जानी चाहिए।
    3. भंडारण और प्रोसेसिंग की सुविधा
      हर गाँव के पास कोल्ड स्टोरेज, गोदाम और प्रोसेसिंग यूनिट होनी चाहिए, ताकि किसान अपनी फसल खराब होने से बचा सके।
    4. सीधा बाजार से जोड़ना
      किसानों को सीधे ग्राहक से जोड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और मंडी सुधार जरूरी हैं।
    5. सस्ती खेती व्यवस्था
      खाद, बीज और बिजली सस्ती होनी चाहिए, ताकि किसान का खर्च कम हो।
      संसद और राजनीति की चुप्पी
      इतना बड़ा नुकसान होने के बावजूद इस मुद्दे पर संसद में बहुत कम चर्चा होती है। किसानों की समस्याएँ अक्सर चुनाव के समय याद आती हैं, उसके बाद भुला दी जाती है

    निष्कर्ष

    जो आज रिपोर्ट सामने सामने आई इसने हमें बताया कि किसानों की हालत कितनी खराब होती जा रही है हमें किसानों के प्रति सम्मान करना चाहिए किसानों के प्रति आदर्श रखना च।हिए

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