भारत में आरक्षण व्यवस्था को समझने के लिए मंडल आयोग और इंदिरा साहनी रिपोर्ट को जानना बहुत ज़रूरी है। ये दोनों देश की सामाजिक न्याय व्यवस्था से सीधे जुड़े हुए हैं।

मंडल आयोग क्या था?
भारत सरकार ने वर्ष 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। इसका उद्देश्य था यह पता लगाना कि देश में कौन-कौन से पिछड़े वर्ग (OBC – Other Backward Classes) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। इस आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मंडल थे, इसलिए इसे मंडल आयोग कहा गया।
मंडल आयोग ने पूरे देश में सर्वे किया और पाया कि भारत की एक बड़ी आबादी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई है। आयोग ने सुझाव दिया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को सरकारी नौकरी और शिक्षा में 27% आरक्षण दिया जाना चाहिए।
मंडल आयोग की सिफारिशें
- OBC वर्ग को 27% आरक्षण
- सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को आधार
- जाति के साथ-साथ सामाजिक स्थिति पर ध्यान
इन सिफारिशों को 1990 में लागू किया गया, जिसके बाद देश में बड़े स्तर पर बहस और आंदोलन हुए।
इंदिरा साहनी केस / रिपोर्ट क्या है?
इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (1992) एक ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। यह केस मंडल आयोग की सिफारिशों को चुनौती देने के लिए दायर किया गया था।
इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण बातें साफ कीं, जिन्हें ही सामान्य रूप से इंदिरा साहनी रिपोर्ट कहा जाता है।
इंदिरा साहनी केस के मुख्य निर्णय
- OBC को 27% आरक्षण वैध है
- कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए
- OBC में क्रीमी लेयर को आरक्षण नहीं मिलेगा
- आरक्षण केवल नौकरी में भर्ती तक सीमित रहेगा, पदोन्नति (Promotion) में नहीं
इस फैसले ने आरक्षण को एक संवैधानिक और संतुलित ढाँचा दिया।
मंडल आयोग और इंदिरा साहनी रिपोर्ट का महत्व
इन दोनों ने मिलकर भारत में सामाजिक न्याय की दिशा तय की। इससे उन वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर मिला जो लंबे समय तक शिक्षा और नौकरियों से वंचित रहे थे। साथ ही, क्रीमी लेयर जैसे नियमों से यह भी सुनिश्चित किया गया कि आरक्षण का लाभ सही लोगों तक पहुँचे।
निष्कर्ष
मंडल आयोग और इंदिरा साहनी रिपोर्ट भारत के सामाजिक इतिहास के दो बहुत महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन्होंने यह सिद्ध किया कि समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि अवसर देने से आती है।
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