• April 2, 2026 3:23 pm

    पराली से सड़क निर्माण: भारत की नई क्रांति

    ByHimanshu Papnai

    Apr 2, 2026

    कृषि के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है, जहाँ पहले धान लगाने के बाद किसान पराली को जलाते थे और इसके कारण प्रदूषण की समस्याएँ होती थीं। जहाँ बार-बार दिल्ली में प्रदूषण के लिए किसानों को जिम्मेदार कहा जाता था, लेकिन बाद में पता चला कि दिल्ली में प्रदूषण की समस्या केवल पराली के कारण नहीं हो रही है। लेकिन यह सच है कि जब किसान पराली को जलाता है, तो मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता पर असर पड़ता है।


    सड़क के निर्माण में पराली का इस्तेमाल किया जाएगा और इसके बारे में पूरी जानकारी आपको इस आर्टिकल में दी गई है।


    पराली का इस्तेमाल सड़क निर्माण मे


    भारत बायो-बिटुमेन (Bio-bitumen) का व्यावसायिक उत्पादन करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। 7 जनवरी 2026 को इस ऐतिहासिक तकनीक का ऐलान किया गया। इसके पीछे दो संस्थाओं का हाथ है—केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान और भारतीय पेट्रोलियम संस्थान ने मिलकर यह शोध किया है।


    यह हमारी आम सड़कों में इस्तेमाल होने वाले बिटुमेन से अलग है। बिटुमेन कच्चे तेल से बनता है, जो हमारे पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन बायो-बिटुमेन इससे बहुत बेहतर है क्योंकि यह कृषि अपशिष्ट से बनता है।


    बिटुमेन वह पदार्थ होता है, जब आप सड़क बनते हुए देखते होंगे तो काले रंग का एक चिपचिपा पदार्थ लगाया जाता है, उसी को बिटुमेन कहा जाता है। बायो-बिटुमेन भी ठीक इसी तरह काम करता है, लेकिन यह कच्चे तेल से नहीं बल्कि कृषि अपशिष्ट से बनता है।
    इसे बनाने के लिए सबसे पहले कृषि कचरा इकट्ठा किया जाता है और उसे बिना ऑक्सीजन के गर्म करके बायो-ऑयल बनाया जाता है।

    उसके बाद उस तेल को अपग्रेड करके बायो-बाइंडर में बदल दिया जाता है। यह भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि 50% भारत अपनी जरूरत का बिटुमेन बाहर से आयात करता है, जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बड़ा भार है। यदि हम अपनी सड़कों में सिर्फ 15% बायो-बिटुमेन भी मिलाना शुरू कर दें, तो हम हर साल 400 करोड़ की विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं।


    पर्यावरण पर इसका अच्छा असर देखने को मिलेगा और प्रदूषण कम होगा।


    इसका फायदा हमें बहुत बड़ा होगा, जैसे


    आयात निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा बचेगी
    पराली जलाने का समाधान मिलेगा, जिससे वायु प्रदूषण और कार्बन फुटप्रिंट कम होगाकिसानों के लिए आय के नए स्रोत पैदा होंगेकिसी भी नई तकनीक को पूरे देश में लागू करना आसान नहीं होता है।

    इस तकनीक को पूरे देश में लागू करने के लिए इसे और विकसित करना होगा, बड़ी-बड़ी कंपनियों को इसके बारे में बताना होगा, नेटवर्क बनाना होगा और क्वालिटी कंट्रोल पर ध्यान रखना होगा।


    यह तकनीक अब वास्तविक जीवन में आ चुकी है। असम-मेघालय बॉर्डर पर जोरबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे पर 100 मीटर की सड़क बनाकर इसका सफल परीक्षण किया गया है और यह सड़क मजबूत पाई गई है।


    यह तकनीक आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


    निष्कर्ष:


    उम्मीद है हमारे द्वारा दी गई जानकारी आपको समझ में आ गई होगी। यदि कोई सवाल है तो कमेंट करके अवश्य पूछें।

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