नमस्कार, अक्सर जब देश में चुनाव होते हैं या किसी राज्य में चुनाव आने वाले होते हैं तो उस समय वहां की सत्ताधारी पार्टी कई ऐसी योजनाएं शुरू कर देती है जिनमें मुफ्त सुविधाएं दी जाती हैं। आम भाषा में इसे “रेवड़ी बांटना” भी कहा जाता है। हमने देखा है कि कई राज्यों पर लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है, जबकि उनकी आमदनी उतनी नहीं है जितना वे मुफ्त योजनाओं पर खर्च कर रहे हैं।
कहीं मुफ्त बिजली दी जा रही है, कहीं महिलाओं को सीधे पैसे दिए जा रहे हैं, तो कहीं बस यात्रा या अन्य सेवाएं मुफ्त की जा रही हैं। यह सोचने वाली बात है कि जब बिजली मुफ्त दी जाती है तो बिजली कंपनियों को भुगतान कौन करेगा? आखिर सरकार को ही भुगतान करना पड़ता है। सरकार जो टैक्स से कमाई करती है, उसका एक बड़ा हिस्सा तो कर्ज चुकाने में चला जाता है, फिर विकास कार्यों के लिए कितना बचता है?
अगर लोगों को मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन और सीधे पैसे मिलते रहेंगे तो कुछ लोग यह भी सोच सकते हैं कि जब सरकार सब दे रही है तो मेहनत करने या नौकरी करने की क्या जरूरत है। हालांकि यह भी सच है कि हर व्यक्ति ऐसा नहीं सोचता, लेकिन इस तरह की योजनाओं का असर अर्थव्यवस्था पर जरूर पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर कहा है कि चुनाव के समय अंधाधुंध मुफ्त योजनाएं घोषित करना आर्थिक रूप से सही नहीं है और इससे देश के विकास पर असर पड़ सकता है।
अदालत ने यह भी कहा है कि सरकारों को लोगों को मुफ्त चीजें देने के बजाय रोजगार के अवसर बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि लोग अपने श्रम से कमाकर सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। जरूरतमंद लोगों को राहत देना अलग बात है, लेकिन जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं, उन्हें भी बिना किसी भेद के मुफ्त सुविधा देना क्या सही नीति है — यह गंभीर विचार का विषय है।
आज कई राज्यों की स्थिति यह है कि वे जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं और कर्ज लगातार बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, पंजाब पर लगभग 3.82 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बताया जाता है और उसकी कमाई का लगभग 20–25 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ ब्याज और कर्ज चुकाने में चला जाता है।
पश्चिम बंगाल पर भी करीब 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है और राज्य राजस्व घाटे में चल रहा है।
तमिलनाडु पर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। केरल पर करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये, कर्नाटक पर लगभग 5 लाख करोड़ रुपये, राजस्थान पर लगभग 5 लाख करोड़ रुपये और उत्तर प्रदेश पर भी 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज बताया जाता है। हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य पर भी करीब 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है।
इन सबके बावजूद मुफ्त बिजली, नकद सहायता और अन्य योजनाएं जारी हैं। पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है और इस पर हजारों करोड़ रुपये सालाना खर्च होते हैं।
मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना योजना, महाराष्ट्र में लाड़की बहन योजना, दिल्ली में मुफ्त बिजली-पानी योजना, पंजाब में मुफ्त बिजली योजना और अन्य राज्यों में भी इसी तरह की योजनाएं चल रही हैं।
सवाल यह है कि यह पैसा आता कहां से है? आखिर यह जनता के टैक्स का ही पैसा है या फिर सरकार कर्ज लेकर इन योजनाओं को चलाती है। चुनाव से ठीक पहले ऐसी योजनाओं की घोषणा अधिक क्यों होती है, यह भी सोचने का विषय है।
जरूरतमंद लोगों को सहायता मिलनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन आर्थिक संतुलन भी जरूरी है।
यदि सरकारें आय से ज्यादा खर्च करती रहेंगी और कर्ज बढ़ता रहेगा तो आने वाले समय में इसका बोझ भी जनता पर ही पड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि मुफ्त योजनाओं और विकास के बीच एक संतुलन बनाया जाए, ताकि देश और राज्यों की अर्थव्यवस्था मजबूत रहे और साथ ही गरीब और जरूरतमंद लोगों को भी उचित सहायता मिलती रहे।
निष्कर्ष
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