• February 2, 2026 8:32 pm

    पहाड़ का सच, पहाड़ की जुबानी

    उत्तराखंड क्रांति दल कोई चमक–दमक वाली राजनीति की उपज नहीं है। यह दल पहाड़ के उस आम इंसान की पीड़ा से पैदा हुआ है, जिसने सालों तक उपेक्षा, अभाव और मजबूरी में जीवन जिया। जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब फैसले दूर लखनऊ में होते थे और पहाड़ के गांवों तक उनकी गूंज भी नहीं पहुंचती थी। सड़क, स्कूल, अस्पताल और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें पहाड़ के लोगों के लिए सपना बनी हुई थीं। इन्हीं हालातों ने लोगों के मन में यह सवाल खड़ा किया कि क्या पहाड़ की किस्मत हमेशा ऐसे ही लिखी रहेगी।

    इसी सोच और इसी पीड़ा से उत्तराखंड क्रांति दल का जन्म हुआ। यह दल सत्ता पाने की चाह में नहीं बना था, बल्कि इसलिए बना था ताकि पहाड़ का आदमी अपनी बात खुद कह सके। यह उन लोगों की आवाज़ बना जिनकी कोई सुनवाई नहीं थी। गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया गया कि अगर हम अपने हक के लिए खुद खड़े नहीं होंगे, तो कोई और हमारे लिए नहीं लड़ेगा। यह एक शांत, लेकिन मजबूत संघर्ष था, जिसमें आम आदमी की भागीदारी ही सबसे बड़ी ताकत थी।

    उत्तराखंड क्रांति दल ने सबसे पहले साफ कहा कि पहाड़ की समस्याओं का हल अलग राज्य में है। यह मांग किसी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं थी, बल्कि इसलिए थी ताकि फैसले पहाड़ की ज़रूरतों के अनुसार लिए जा सकें। आंदोलन के दौरान लोगों ने रैलियां निकालीं, धरने दिए और कई बार अपनी जान तक गंवाई। 1990 के दशक का आंदोलन और 1994 की घटनाएं आज भी पहाड़ के लोगों के दिल में जिंदा हैं। इस संघर्ष ने अंततः 2000 में उत्तराखंड राज्य के गठन का रास्ता खोला।


    राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब पहाड़ की तस्वीर बदलेगी। कुछ बदलाव जरूर आए, लेकिन समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। आज भी पलायन जारी है, गांव खाली हो रहे हैं और रोजगार की तलाश में युवा पहाड़ छोड़ने को मजबूर हैं। बड़े राजनीतिक दल सत्ता में आए और गए, लेकिन पहाड़ का आम आदमी आज भी अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। ऐसे में उत्तराखंड क्रांति दल बार-बार याद दिलाता है कि राज्य बनना ही आखिरी मंज़िल नहीं थी, असली मंज़िल है पहाड़ में सम्मान के साथ जीने का अधिकार।


    उत्तराखंड क्रांति दल की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि इसकी राजनीति जमीन से जुड़ी रही। इसने हमेशा जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों के अधिकार की बात की। इसने कहा कि पहाड़ को बचाना है तो पहाड़ के लोगों को मजबूत करना होगा। यह दल बड़े वादों और भाषणों से दूर रहकर सीधी, सच्ची और मानवीय बात करता रहा।
    आज भले ही उत्तराखंड क्रांति दल सत्ता में बड़ी भूमिका में न हो, लेकिन इसकी सोच और विचारधारा आज भी जिंदा है। जब भी गांव बचाने की बात होती है, जब भी पलायन रोकने की चर्चा होती है, तब यह सोच अपने आप सामने आ जाती है। यह कहानी किसी पार्टी की जीत या हार की नहीं है, बल्कि उस आम पहाड़ी इंसान की है जो अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने भविष्य को बचाना चाहता है।

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