जब भी “रेगिस्तान के जहाज” की बात होती है, तो सबसे पहले हमारे मन में ऊंट का ही नाम आता है। सदियों से ऊंट न केवल राजस्थान की पहचान रहे हैं, बल्कि यहां के जनजीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का भी अहम हिस्सा रहे हैं। देश में पाए जाने वाले कुल ऊंटों में से लगभग 84 प्रतिशत ऊंट राजस्थान में पाए जाते हैं। यही कारण है कि राजस्थान को ऊंटों की भूमि भी कहा जाता है।
लेकिन आज यही पहचान एक बड़े संकट से गुजर रही है। 20वीं राष्ट्रीय पशुगणना (2019) के अनुसार, पिछले सात वर्षों में राजस्थान में ऊंटों की संख्या में लगभग 34.39 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जहां पहले ऊंटों की संख्या 3.26 लाख थी, वहीं 2019 में यह घटकर केवल 2.13 लाख रह गई। यह गिरावट न केवल चिंताजनक है, बल्कि आने वाले समय के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है।
ऊंटों की संख्या घटने के मुख्य कारण
की रिपोर्ट के अनुसार ऊंटों की आबादी में कमी के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है चरवाहों की संख्या में लगातार कमी। बदलते समय के साथ युवा पीढ़ी ऊंट पालन से दूरी बना रही है और रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रही है।
इसके अलावा, कृषि और यातायात के आधुनिक साधनों का बढ़ता उपयोग भी ऊंटों की उपयोगिता को कम कर रहा है। पहले जहां ऊंट खेती, माल ढुलाई और यात्रा का प्रमुख साधन था, आज उसकी जगह ट्रैक्टर, ट्रक और अन्य मशीनों ने ले ली है।
एक और गंभीर समस्या है चारे की अनुपलब्धता और महंगाई। चरागाहों की कमी और बढ़ती जमीन की कीमतों के कारण ऊंट पालना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। कई जगहों पर अवैध रूप से ऊंटों का वध भी इस गिरावट का कारण बन रहा है, जो कानून और परंपरा दोनों के खिलाफ है।
साथ ही कुछ रूढ़िवादी मान्यताएं भी ऊंटों की संख्या को प्रभावित कर रही हैं। ऊंट पालने वाले कुछ समाजों में यह धारणा है कि ऊंटनी का दूध बेचना उचित नहीं है, जिससे आर्थिक लाभ न होने के कारण लोग ऊंट पालन छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं।

एक सांस्कृतिक विरासत खतरे में
ऊंट केवल एक पशु नहीं है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। मेलों, त्योहारों, लोकगीतों और जीवनशैली में ऊंट की विशेष भूमिका रही है। अगर ऊंटों की संख्या इसी तरह घटती रही, तो आने वाली पीढ़ियां शायद ऊंट को केवल किताबों या तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
समाधान की आवश्यकता
आज जरूरत है कि सरकार, समाज और युवा पीढ़ी मिलकर ऊंट संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएं। ऊंट पालन को आर्थिक रूप से लाभकारी बनाना, चरागाहों का संरक्षण, ऊंटनी के दूध और उससे बने उत्पादों को बढ़ावा देना तथा अवैध वध पर सख्ती से रोक लगाना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष
राजस्थान में ऊंटों की घटती संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, संस्कृति और परंपरा के कमजोर होने का संकेत है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो “रेगिस्तान का जहाज” कहलाने वाला ऊंट इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। यह हम सभी के लिए दुख और चिंता का विषय है, और साथ ही एक जिम्मेदारी भी कि हम अपनी इस अनमोल धरोहर को बचाएं।
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