• February 2, 2026 8:33 pm

    छात्रों का भविष्य बर्बाद कर रही हैं प्राइवेट यूनिवर्सिटी: सपनों की कीमत इतनी भारी क्यों?

    आज का छात्र सिर्फ किताबों का बोझ नहीं उठा रहा, वह फीस की पर्ची, कर्ज का डर और भविष्य की अनिश्चितता भी अपने कंधों पर ढो रहा है। देश में तेजी से बढ़ती प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ शिक्षा के मंदिर कम और कमाई के कारखाने ज़्यादा बनती जा रही हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उस छात्र को हो रहा है, जो बेहतर भविष्य का सपना लेकर इनके दरवाज़े तक पहुंचता है।

    सपनों की शुरुआत, कर्ज सेप्राइवेट यूनिवर्सिटी में दाख़िला लेते समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं—बेहतर प्लेसमेंट, शानदार कैंपस, इंटरनेशनल एक्सपोज़र।लेकिन कुछ ही महीनों में हकीकत सामने आने लगती है।एक छात्र के हाथ में जब ₹3–4 लाख सालाना फीस की रसीद आती है, तो वह पढ़ाई से पहले हिसाब-किताब करने को मजबूर हो जाता है। ट्यूशन फीस, एडमिशन फीस, हॉस्टल, लाइब्रेरी, एग्ज़ाम—हर चीज़ के नाम पर पैसा।और अगर समय पर फीस न दो, तो—“UNPAID” की मुहर।

    पढ़ाई से ज़्यादा दबावजब छात्र पढ़ाई के बजाय यह सोचने लगे कि अगली किस्त कैसे भरी जाएगी, तो शिक्षा का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।

    कई छात्र पढ़ाई के साथ पार्ट-टाइम काम करने को मजबूर हैंकई मानसिक तनाव और डिप्रेशन में चले जाते हैंकुछ तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैंयह सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं, मानसिक उत्पीड़न भी है।

    प्लेसमेंट के वादे और ज़मीनी हकीकत

    प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ के ब्रोशर में लाखों के पैकेज दिखाए जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि:गिनी-चुनी कंपनियाँ आती हैं

    ज्यादातर छात्रों को औसत या नाममात्र की नौकरी मिलती हैकई को डिग्री के बाद भी बेरोज़गारी का सामना करना पड़ता हैफिर सवाल उठता है—इतनी महंगी पढ़ाई के बाद भी अगर नौकरी नहीं, तो फायदा किसका?

    शिक्षा या व्यापार?

    आज शिक्षा को सेवा नहीं, प्रोडक्ट बना दिया गया है।जिसके पास पैसा है, वह दाख़िला पा सकता है,जिसके पास नहीं है—वह चाहे कितना ही मेहनती क्यों न हो, पीछे छूट जाता है।यह सिस्टम योग्यता नहीं, जेब की हैसियत देखता है।

    परिवार भी टूट रहा है

    अंदर सेकई माता-पिता:

    ज़मीन बेच रहे हैंकर्ज़ ले रहे हैंअपनी ज़रूरतें छोड़ रहे हैंसिर्फ इसलिए कि उनका बच्चा पढ़ सके।

    और जब वही बच्चा डिग्री लेकर भी संघर्ष करता है, तो टूटता सिर्फ छात्र नहीं—पूरा परिवार टूट जाता है।

    सवाल सिस्टम से है, शिक्षा से नहींयह लेख शिक्षा के खिलाफ नहीं है।यह सवाल उस सिस्टम से है,जो छात्रों के सपनों को EMI में बदल देता है।अगर शिक्षा इतनी महंगी ही रहनी है, तो:फीस पर नियंत्रण क्यों नहीं?प्लेसमेंट की जवाबदेही क्यों नहीं?छात्रों के हित में सख़्त नियम क्यों नहीं?

    समाधान क्या हो सकता है?

    प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ की फीस पर सरकारी निगरानीप्लेसमेंट डेटा की पारदर्शिताछात्रों के लिए शिकायत और सुरक्षा तंत्रशिक्षा को व्यापार नहीं, जिम्मेदारी माना जाए

    निष्कर्ष:

    भविष्य चाहिएआज का छात्र भीख नहीं मांग रहा।वह सिर्फ इतना चाहता है किजिस भविष्य का सपना दिखाया गया था,वह सपना कर्ज़ और तनाव में न बदल जाए।अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया,तो आने वाले सालों मेंडिग्रीधारी युवा होंगे—लेकिन भविष्यहीन।और यह किसी एक छात्र की नहीं,पूरे देश की हार होगी।

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