नमस्कार,
मैं उत्तराखंड से हूँ। जब हम उत्तराखंड का नाम सुनते हैं, तो हमारे मन में इसकी संस्कृति, सभ्यता, सरल स्वभाव और बलिदान की तस्वीर उभरती है। यह वही भूमि है जिसके लिए लोगों ने संघर्ष किया, शहादत दी और उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक नया राज्य बनाया।

लेकिन आज उसी उत्तराखंड को देखकर मन में दुख और शर्म दोनों महसूस होती है, क्योंकि कुछ लोग इसे केवल राजनीति का अखाड़ा बना चुके हैं।
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन आज देवभूमि से बच्चे पलायन कर रहे हैं। वे दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों में नौकरी करने को मजबूर हैं। गांव खाली हो रहे हैं, पहाड़ सूने पड़ते जा रहे हैं।
सरकार कहती है कि हम विकास कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि जहां से लोग पलायन कर रहे हों, क्या उसे विकास कहा जा सकता है? आज भी उत्तराखंड में कई ऐसे गांव हैं जहां सड़क नहीं है, पीने का पानी नहीं है, और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, इसी कारण बाघ, भालू और जंगली जानवर गांवों में घुस रहे हैं। कभी भालू का हमला होता है, तो कभी बाघ इंसानी बस्तियों तक आ जाता है। यह केवल एक समस्या नहीं, बल्कि गलत नीतियों का परिणाम है। इसी बीच अंकिता भंडारी जैसे मामले सामने आते हैं, जो पूरे प्रदेश को झकझोर देते हैं और यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर उत्तराखंड में किस तरह की राजनीति और व्यवस्था चल रही है।
राज्य बनाने के लिए लोगों ने लंबा संघर्ष किया था, लेकिन आज उत्तराखंड को सिर्फ वादों और घोषणाओं तक सीमित कर दिया गया है। विश्वविद्यालयों में राजनीति हो रही है, भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक हो रहे हैं। पटवारी भर्ती का पेपर लीक हुआ, पशुधन प्रसार अधिकारी की भर्ती हाईकोर्ट में चली गई और तब से भर्तियां ठप हैं।
25 साल का युवा घर में बैठा है, बेरोजगार है—क्या यही विकास है?
शिक्षा व्यवस्था की हालत भी चिंताजनक है। स्कूलों की फीस लगातार बढ़ रही है, गरीब और मिडिल क्लास अपने बच्चों को पढ़ाने में असमर्थ हो रहे हैं। कॉलेजों में मनमानी चल रही है—पैसा दो, पास हो जाओ। प्राइवेट कॉलेज 100% प्लेसमेंट का दावा करते हैं, जो हकीकत से कोसों दूर है। न बच्चों को सही स्किल सिखाई जा रही है, न ही रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं।
मैं खुद एक सरकारी यूनिवर्सिटी से पढ़ा हूँ। रिजल्ट और डिग्री वर्षों तक नहीं मिलती। 2023 बैच की डिग्री अब मिल रही है और 2024 बैच का भविष्य पता नहीं। योजनाएं कागजों में बनती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका असर दिखाई नहीं देता। मैंने खुद शौचालय योजना के तहत काम करवाया, लेकिन यह कहकर पैसा नहीं दिया गया कि पिता सरकारी कर्मचारी थे—ऐसे नियम कहां लिखे हैं, यह कोई बताने को तैयार नहीं।
मैंने उत्तराखंड राज्य गीत को लेकर भी प्रयास किया। मैंने सीएम पोर्टल पर शिकायत और अनुरोध दर्ज कराया, जिसके बाद उधम सिंह नगर में इसे लागू भी किया गया। लेकिन सच्चाई यह है कि मुझे आज भी नहीं लगता कि यह ज़मीन स्तर पर पूरी तरह लागू हुआ होगा, क्योंकि हमारे यहां अधिकतर अच्छे फैसले और वादे फाइलों में दब जाते हैं या सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाते हैं।
अगर सच में विकास हुआ होता, तो पहाड़ों में अकेले रह रहे बुजुर्ग, खाली गांव, बेरोजगार युवा, खराब सड़कें और कमजोर सरकारी स्कूल नजर नहीं आते। आम आदमी सच बोलने से डरता है, क्योंकि उसे पता है कि सच्चाई बोलने पर उसे ही परेशानी झेलनी पड़ेगी
विकास के नारे लगाना आसान है, लेकिन करके दिखाना मुश्किल।
उत्तराखंड को राजनीति नहीं, बल्कि ईमानदार प्रशासन, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा चाहिए। अगर उत्तराखंड का युवा जाग गया और सवाल पूछने लगा, तो सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा। तभी उत्तराखंड सच में देवभूमि बन पाएगा, केवल नाम से नहीं, काम से।
आज अगर प्राइवेट कॉलेजों की बात करें, तो हालात और भी चिंताजनक हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि कई प्राइवेट कॉलेज हजारों–लाखों रुपये की फीस वसूलते हैं, लेकिन बदले में न पढ़ाई होती है, न सुविधा मिलती है। प्लेसमेंट जीरो, पढ़ाई जीरो और सुविधाएं भी जीरो जैसी स्थिति बनी हुई है। कॉलेज केवल बच्चों को दाखिला देने और फीस लेने का केंद्र बन गए हैं।कॉलेजों में लैब के नाम पर सिर्फ कमरे बने हैं, लेकिन बच्चों को लैब में ले जाया ही नहीं जाता। जब प्रैक्टिकल ही नहीं कराया जाएगा, तो छात्र सीखेंगे क्या? किताबों में लिखी बातों से डिग्री तो मिल सकती है, लेकिन काम करने की समझ नहीं। हॉस्टल और कैंटीन की स्थिति यह है कि खाने की गुणवत्ता इतनी खराब होती है कि कई बार खाना खाने लायक भी नहीं होता, लेकिन छात्र मजबूरी में वही खाते हैं।
इसके बाद जब यही छात्र नौकरी की तलाश में कंपनियों के पास जाता है, तो उसे 10 से 12 हजार रुपये की नौकरी ऑफर की जाती है। अब सवाल यह है कि 10–12 हजार रुपये में कोई व्यक्ति अपना परिवार कैसे चलाएगा? किराया, बिजली, पानी, राशन, इलाज और जिम्मेदारियां—क्या यह सब 10–12 हजार में संभव है? यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि शोषण है।सरकार और सिस्टम बार-बार युवाओं से कहते हैं कि मेहनत करो, नौकरी करो, आत्मनिर्भर बनो। लेकिन जब पढ़ाई अधूरी हो, स्किल न सिखाई जाए और नौकरी मिले भी तो इतनी कम तनख्वाह पर तो युवा आखिर क्या करे?
सब्जी का ठेला लगाना मजबूरी बन जाता है, न कि विकल्प।
और फिर यही कहा जाता है कि युवा काम नहीं करना चाहता।यह सब देखकर यही सवाल उठता है कि क्या यह वही विकास है, जिसकी बात हर मंच से की जाती है? अगर शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन नहीं मिल पा रहा, तो विकास सिर्फ भाषणों और फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।
आज की सच्चाई यह भी है कि कई निजी कंपनियां युवाओं से काम तो पूरा करवाती हैं, लेकिन पीएफ तक नहीं काटतीं। वजह सीधी है—उन्हें कर्मचारी के भविष्य की चिंता नहीं, बस अपना फायदा दिखता है। पीएफ काटेंगे तो पैसा जमा करना पड़ेगा, ब्याज देना पड़ेगा, इसलिए वे रास्ता ही बदल लेते हैं।
कागजों में सब ठीक दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत में युवा बिना किसी सुरक्षा के काम करता रहता है।ऐसे में युवक सोचता है कि आज तो नौकरी है, लेकिन कल अगर कंपनी ने निकाल दिया तो उसके पास क्या बचेगा? न कोई जमा पूंजी, न कोई सहारा। बीमारी हो जाए, घर में कोई परेशानी आ जाए, तो सब कुछ उसी कम तनख्वाह में संभालना पड़ता है। यह नौकरी कम और मजबूरी ज्यादा लगने लगती है।
सरकार कहती है कि युवा आत्मनिर्भर बने, मेहनत करे, आगे बढ़े। लेकिन जब उसे 10–12 हजार की तनख्वाह, बिना पीएफ, बिना सुरक्षा और बिना सम्मान के साथ काम करना पड़े, तो आत्मनिर्भरता सिर्फ शब्द बनकर रह जाती है। पढ़ा-लिखा युवा जब ऐसे हालात में फंस जाता है, तो उसका मन टूटता है, आत्मविश्वास खत्म होता है।विकास वही होता है जहां युवा को काम के साथ-साथ भविष्य की सुरक्षा भी मिले। अगर युवा सिर्फ आज के लिए काम करे और कल की चिंता में जीता रहे, तो इसे विकास नहीं कहा जा सकता। यह तो एक ऐसा सिस्टम है, जहां मेहनत करने वाला हमेशा असुरक्षित रहता है और फायदा उठाने वाला मजबूत होता जाता है।
अभी कुछ समय पहले मैंने उत्तराखंड राज्य गीत को लेकर अपनी तरफ से पहल की थी। इस विषय पर मैंने खुलकर चर्चा की और सीएम हेल्पलाइन में भी शिकायत/अनुरोध दर्ज कराया। कागजों में कार्रवाई हुई और बताया गया कि उधम सिंह नगर में इसे लागू भी कर दिया गया है। यह सुनकर अच्छा जरूर लगा, लेकिन मन में एक सवाल आज भी बना हुआ है।मुझे ऐसा नहीं लगता कि यह फैसला ज़मीन स्तर तक सही मायने में पहुंचा होगा।
हमारे यहां अक्सर ऐसा ही होता है—निर्णय लिए जाते हैं, आदेश निकल जाते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे फाइलों में दब जाते हैं या कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। बाहर से सब ठीक दिखता है, पर असल में बदलाव दिखाई नहीं देता।उत्तराखंड राज्य गीत सिर्फ एक गीत नहीं है, यह हमारी पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान से जुड़ा विषय है।
अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाए, तो नई पीढ़ी को अपने राज्य से जुड़ने का मौका मिलेगा। लेकिन अगर ऐसे फैसले सिर्फ रिकॉर्ड में रह जाएं, तो उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता।यही समस्या आज उत्तराखंड की कई योजनाओं और नीतियों के साथ है। घोषणाएं बहुत होती हैं, लेकिन असर कम दिखता है। जब तक कोई निर्णय गांव, स्कूल, कॉलेज और आम आदमी की जिंदगी में बदलाव नहीं लाता, तब तक उसे सफल नहीं कहा जा सकता।
निष्कर्ष
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उत्तराखंड का इतिहास क्या है|(What is the history of Uttarakhand)

