जब हम कॉलेज में पढ़ाई की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में यही सवाल उठता है कि हमें कौन-सा कोर्स करना चाहिए। परिवार कुछ और सलाह देता है, दोस्त कुछ और, और समाज की अपनी अलग राय होती है। कोई कहता है यह कोर्स कर लो, नौकरी जल्दी लगेगी। कोई कहता है यह वाला कोर्स भविष्य के लिए अच्छा है। वहीं प्राइवेट कॉलेज बड़े आत्मविश्वास के साथ दावा करते हैं कि उनके यहाँ 100 प्रतिशत प्लेसमेंट होता है।लेकिन इन सब बातों के बीच एक बहुत ज़रूरी सवाल अक्सर दब जाता है ।

क्या बच्चों को सही मायने में शिक्षा मिल रही है?
आज ज़्यादातर चर्चा कोर्स और प्लेसमेंट तक ही सीमित रह गई है। कोई यह नहीं पूछता कि कॉलेज बच्चों को क्या सिखा रहा है, उन्हें कितनी प्रैक्टिकल जानकारी दी जा रही है, और क्या उन्हें उनके चुने हुए कोर्स के भविष्य के बारे में सही दिशा दिखाई जा रही है या नहीं।
प्लेसमेंट का शोर और पढ़ाई की चुप्पी
कई कॉलेज बड़े-बड़े आंकड़े दिखाते हैं — इतने बच्चों का प्लेसमेंट, इतनी कंपनियाँ आईं। लेकिन असलियत यह है कि हर बच्चा उस आंकड़े का हिस्सा नहीं होता। कुछ गिने-चुने बच्चों को आगे रखकर पूरे कॉलेज की तस्वीर चमकदार बना दी जाती है, जबकि बाकी बच्चे सिर्फ़ उम्मीद लेकर बैठ जाते हैं।
लैब और ट्रेनिंग: नाम की या काम की?
कोई भी कोर्स हो — इंजीनियरिंग हो या एग्रीकल्चर — बिना लैब और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के वह अधूरा है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि कई जगह बच्चों को बार-बार लैब तक नहीं ले जाया जाता। प्रैक्टिकल सिर्फ़ सिलेबस पूरा करने के लिए करवा दिया जाता है,
स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान बहुत कम दिया जाता है।
कॉलेज के भीतर चल रहा एक अलग ही खेल
जब मैं देहरादून में पढ़ता था और उसी विश्वविद्यालय के माहौल को नज़दीक से देखा, तब एक ऐसी सच्चाई सामने आई जो चौंकाने वाली थी। कई प्राइवेट कॉलेजों में पढ़ाई से ज़्यादा ज़ोर एडमिशन पर होता है। बच्चों को पढ़ाने के बजाय बच्चों को लाने की होड़ लगी रहती है।
यहाँ तक कहा जाता है —
अगर आप किसी बच्चे का एडमिशन करवाते हो, तो आपको पैसे मिलेंगे। यानी रेफरल मनी।
कहीं B.Tech के एक बच्चे का एडमिशन कराने पर ₹35,000 दिए जाते हैं,
तो कहीं B.Sc Agriculture के एक बच्चे पर ₹20,000।
धीरे-धीरे यह शिक्षा नहीं, बल्कि पूरा का पूरा बिज़नेस मॉडल बन जाता है –
“बच्चे लाओ, पैसे कमाओ।”
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
इस पूरे सिस्टम में सबसे ज़्यादा नुकसान उस बच्चे का होता है जो भरोसा करके कॉलेज में दाख़िला लेता है। उसे न सही मार्गदर्शन मिलता है, न कोर्स की सच्चाई बताई जाती है, और न ही भविष्य की पूरी तस्वीर।
अब सोचने का समय है
आज ज़रूरत इस बात की है कि:
कॉलेज सिर्फ़ एडमिशन सेंटर न बनें बच्चों को कोर्स के भविष्य की सही जानकारी दी जाएलैब, ट्रेनिंग और स्किल पर असली काम होऔर शिक्षा को फिर से शिक्षा बनने दिया जाएक्योंकि अगर कॉलेज सिर्फ़ पैसा कमाने की मशीन बनते रहे, तो आने वाले समय में डिग्रियाँ तो होंगी, लेकिन काबिलियत नहीं।
निष्कर्ष
उम्मीद करते हैं हमारेद्वारा बताइए गई जानकारी आपको समझ में आ गई होगी यदि कोई सवाल तो कमेंटकरके पूछ
SSL क्या है, कैसे काम करता है और कहां से खरीदें ?[SSL in hindi]

