अमूल की कहानी भारत के किसानों की मेहनत, एकता और आत्मनिर्भरता की कहानी है। इसकी शुरुआत वर्ष 1946 में गुजरात के आनंद ज़िले से हुई, जब दूध उत्पादक किसानों को उनके दूध का सही दाम नहीं मिल पा रहा था और बिचौलियों द्वारा उनका शोषण किया जाता था। किसानों ने मिलकर एक सहकारी संस्था बनाई ताकि वे अपना दूध खुद इकट्ठा करें, प्रोसेस करें और बाज़ार में बेचें। इसी प्रयास से अमूल की नींव पड़ी।

“अमूल” शब्द का अर्थ है अनमोल, जो किसानों के परिश्रम और दूध की शुद्धता का प्रतीक है।
अमूल का सबसे बड़ा योगदान 1970 के दशक में शुरू हुई श्वेत क्रांति में रहा। इस क्रांति के जरिए अमूल के सहकारी मॉडल को पूरे देश में अपनाया गया, जिससे भारत दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बना और दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल हुआ। गाँव-गाँव में दुग्ध समितियाँ बनीं, किसानों को दूध का उचित मूल्य मिला और उनकी आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई। अमूल का ढाँचा ऐसा है जिसमें किसान ही मालिक होते हैं और मुनाफ़ा सीधे उन्हीं तक पहुँचता है
आज अमूल दूध, मक्खन, घी, दही, पनीर, आइसक्रीम और कई अन्य उत्पादों के साथ हर घर में भरोसे का नाम बन चुका है। इसके विज्ञापन, खासकर अमूल गर्ल, सामाजिक घटनाओं पर हल्के-फुल्के अंदाज़ में संदेश देते हैं और लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। अमूल की पूरी कहानी यह सिखाती है कि जब किसान संगठित होकर ईमानदारी से काम करते हैं, तो वे न केवल अपनी ज़िंदगी बदलते हैं, बल्कि पूरे देश के विकास में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
निष्कर्ष
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