नमस्कार,अभी कुछ वक्त पहले देखा गया कि भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापारिक समझौता हुआ है, जिसके कारण किसान संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? चलिए, हम आपको बताते हैं।

देखिए, अमेरिका ने भारत के लिए टैरिफ 55% से घटाकर 15% कर दिया है। कई लोग इसे अच्छी बात मान रहे हैं, और हम भी कहते हैं कि यह सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन अगर हम 2000 से 2007 के बीच की बात करें, तो उस समय भारत पर अमेरिका का टैरिफ सिर्फ 1.5% से 2% के बीच था।
अब समझिए, टैरिफ का मतलब होता है टैक्स। जब टैरिफ कम होता है, तो अमेरिका में भारतीय प्रोडक्ट सस्ते मिलते हैं। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि भारत अमेरिका के लिए यहां टैरिफ जीरो या बहुत कम कर दे। ऐसे में क्या होगा? भारत में अमेरिका का सामान सस्ते दामों पर मिलने लगेगा।
अगर हम भारत के कृषि उत्पादन की बात करें, तो पिछले कुछ समय में दालों का उत्पादन अच्छा हुआ है। लगभग 256 मिलियन टन उत्पादन हुआ, फिर भी हमें निर्यात करना पड़ा, क्योंकि हमारी जनसंख्या बहुत ज्यादा है। अब अगर अमेरिका का सामान सस्ता मिलेगा, तो लोग वही खरीदेंगे।
एक और बड़ी बात यह है कि अमेरिका जीएम फसलें यानी जेनेटिक मॉडिफाइड फसलें उगाता है और उनका निर्यात करता है। भारत में अभी जीएम फसलों पर रोक है, सिर्फ बीटी कॉटन की अनुमति है। अगर अमेरिका से सीधे जीएम फसलें भारत आने लगीं, तो इससे हमारे किसानों को बहुत नुकसान होगा।
खासकर सोयाबीन के किसानों को घाटा होगा, क्योंकि पहले ही सोयाबीन पर न्यूनतम समर्थन मूल्य बहुत कम है। दूसरा, भारत एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें मक्का और सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचने वाले पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।
अब अगर अमेरिका से ये प्रोडक्ट सस्ते दामों पर आने लगेंगे, तो यहां के किसानों को नुकसान होगा। पहले ही उन्हें उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता था, और अब तो मिलने की संभावना और कम हो जाएगी।
इसी कारण से किसान संगठन इस समझौते का विरोध कर रहे हैं और अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं।
और एक बड़ी समस्या यह भी है कि किसानों को उनकी फसल का वह दाम अक्सर नहीं मिल पाता, जिसकी वे उम्मीद करते हैं। हमारे देश का कृषि बाजार बहुत बड़ा है, लेकिन उसमें पहले से ही कई तरह की परेशानियां हैं।
अब अगर ऐसे में अमेरिका का सस्ता सामान भारत के बाजार में आने लगेगा, तो यहां के किसान मुकाबला नहीं कर पाएंगे। धीरे-धीरे उनके उत्पाद बाजार से बाहर हो सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि विदेशी सामान हावी हो जाएगा और देश के किसान पीछे छूट जाएंगे।इससे किसानों की आमदनी पर सीधा असर पड़ेगा और उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाएगी। इसलिए किसान इस समझौते को लेकर चिंतित हैं और डर रहे हैं कि कहीं इससे उनका भविष्य खतरे में न पड़ जाए।
निष्कर्ष
उम्मीद करते हमारे द्वारा बताइए जानकारी आपको समझ में आ गई होगी यदि कोई सवाल सवाल है तो आप कमेंट करके पूछ सकते हैं।
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