उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यह राज्य अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और संस्कारों के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी देवभूमि में शिक्षा की हालत धीरे-धीरे ऐसी होती जा रही है, जिस पर अगर आज गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में इसके परिणाम बेहद डरावने हो सकते हैं। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में प्रधानाचार्यों की कमी, शिक्षकों की भारी कमी, पढ़ाई के प्रति लापरवाही और बच्चों की घटती रुचि—ये सब मिलकर राज्य की शिक्षा व्यवस्था को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं।स्कूल तो हैं, लेकिन व्यवस्था अधूरी हैराज्य के पहाड़ी और दूरस्थ इलाकों में ऐसे सैकड़ों स्कूल हैं, जिनकी इमारत तो खड़ी है, लेकिन शिक्षा की आत्मा वहां से गायब होती जा रही है।

कई विद्यालयों में वर्षों से स्थायी प्रधानाचार्य नियुक्त नहीं हुए हैं। कहीं किसी दूसरे स्कूल का प्रधानाचार्य अतिरिक्त प्रभार संभाल रहा है, तो कहीं सारा बोझ एक-दो शिक्षकों के कंधों पर डाल दिया गया है। जब नेतृत्व ही कमजोर होगा, तो पूरी व्यवस्था कैसे मजबूत हो सकती है?प्रधानाचार्य केवल एक पद नहीं होता, बल्कि वह स्कूल की दिशा और दशा तय करता है। उसकी अनुपस्थिति में स्कूलों में अनुशासन, शैक्षणिक योजना और शिक्षकों की निगरानी—all कुछ प्रभावित होता है। यही कारण है कि कई स्कूलों में पढ़ाई नाम मात्र की रह गई है।
शिक्षकों की कमी:
एक शिक्षक, कई कक्षाएँउत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब स्थिति चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है। कई विद्यालयों में एक ही शिक्षक को तीन-चार कक्षाओं और अलग-अलग विषयों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दे दी जाती है।
गणित का शिक्षक हिंदी पढ़ा रहा है, और सामाजिक विज्ञान का शिक्षक विज्ञान संभाल रहा है। ऐसे में बच्चों को विषय की गहराई कैसे समझ आएगी?शिक्षक भी इंसान हैं।
जब उन पर काम का अत्यधिक दबाव होगा, तो न तो वे ठीक से तैयारी कर पाएंगे और न ही बच्चों पर व्यक्तिगत ध्यान दे पाएंगे। परिणामस्वरूप पढ़ाई केवल किताबें खोलने और बंद करने तक सीमित रह जाती है।
हिंदी और सामाजिक विज्ञान से क्यों दूर हो रहे बच्चे
हिंदी हमारी मातृभाषा है और सामाजिक विज्ञान हमें समाज, इतिहास और लोकतंत्र को समझना सिखाता है। लेकिन आज यही विषय बच्चों को सबसे ज्यादा उबाऊ लगने लगे हैं। इसका कारण बच्चे नहीं, बल्कि पढ़ाने का तरीका और व्यवस्था है।कई स्कूलों में हिंदी और सामाजिक विज्ञान की कक्षाएँ नियमित रूप से नहीं लगतीं। कभी शिक्षक अनुपस्थित रहता है, तो कभी किसी और काम में लगा दिया जाता है। जब लगातार पढ़ाई नहीं होगी, तो बच्चों का जुड़ाव टूटना स्वाभाविक है। धीरे-धीरे बच्चे इन विषयों को “बोझ” समझने लगते हैं और सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए रटने तक सीमित रह जाते हैं।
वेतन समय पर, जिम्मेदारी लापता
यह कहना गलत नहीं होगा कि आज शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की भारी कमी है। कई जगहों पर शिक्षक समय पर वेतन तो प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन पढ़ाने की गुणवत्ता पर कोई सख्त निगरानी नहीं है। कुछ शिक्षक पूरे मन से मेहनत कर रहे हैं,
लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो केवल उपस्थिति दर्ज कराकर औपचारिकता निभा रहे हैं।जब किसी भी व्यवस्था में काम और परिणाम का मूल्यांकन नहीं होता, तो लापरवाही बढ़ती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को होता है, जो बिना किसी गलती के कमजोर शिक्षा व्यवस्था का शिकार बन जाते हैं।
प्रशासनिक कामों में उलझे शिक्षक
शिक्षकों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें अक्सर गैर-शैक्षणिक कामों में लगा दिया जाता है। कभी सर्वे, कभी चुनाव ड्यूटी, कभी सरकारी योजनाओं की रिपोर्टिंग—इन सबके बीच पढ़ाई पीछे छूट जाती है। कक्षाएँ या तो खाली रहती हैं या फिर खानापूर्ति के लिए ली जाती हैं।
पहाड़ के बच्चों की दोहरी चुनौतीउत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के बच्चों के सामने पहले से ही कई चुनौतियाँ हैं—दूरी, संसाधनों की कमी, इंटरनेट और तकनीक की सीमित पहुंच। जब इन सबके ऊपर स्कूलों में पढ़ाई भी ढंग से न हो, तो उनका भविष्य और ज्यादा अंधकारमय हो जाता है। कई बच्चे मजबूरी में पढ़ाई छोड़ देते हैं, तो कई निजी स्कूलों की ओर रुख करते हैं, जो हर परिवार के लिए संभव नहीं है।कमजोर बुनियाद, कमजोर भविष्यप्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा किसी भी बच्चे के जीवन की नींव होती है।
अगर यही नींव कमजोर रह गई, तो आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाएँ, उच्च शिक्षा और रोजगार—हर स्तर पर बच्चा पिछड़ता चला जाता है। उत्तराखंड के हजारों बच्चे आज इसी कमजोर नींव के साथ आगे बढ़ने को मजबूर हैं।सरकारी दावे और जमीनी हकीकतकागजों में स्कूलों की स्थिति बेहतर दिखाई जाती है। रिपोर्टों में सब कुछ ठीक बताया जाता है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
गांवों के लोग, अभिभावक और खुद बच्चे इस सच्चाई को रोज जीते हैं। उनकी आवाज़ अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती है।
समाधान क्या है?
इस समस्या का समाधान केवल घोषणाओं से नहीं होगा। इसके लिए ईमानदार और ठोस कदम उठाने होंगे:रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति – प्रधानाचार्य और विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति प्राथमिकता पर हो।जवाबदेही तय हो – पढ़ाई की गुणवत्ता की नियमित निगरानी की जाए।शिक्षकों को पढ़ाने दिया जाए – गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखा जाए।
हिंदी और सामाजिक विज्ञान को रोचक बनाया जाए – नई शिक्षण विधियों और गतिविधियों के माध्यम से।ग्रामीण और पहाड़ी स्कूलों पर विशेष ध्यान – अलग नीति और अतिरिक्त संसाधन।
पंचायत का मामला निपटा, चुनाव भी हुए — फिर प्रधानाचार्य नियुक्ति क्यों अटकी?
पंचायत से जुड़ा मामला जब उत्तराखंड हाई कोर्ट में चल रहा था, तो उस पर अपेक्षाकृत कम समय में सुनवाई हुई और फैसला भी आ गया। उसी के बाद पंचायत चुनाव भी संपन्न हो गए।
लेकिन इसके उलट, प्रधानाचार्य की नियुक्ति से संबंधित मामला अब तक न तो स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध हुआ है और न ही उस पर कोई ठोस सुनवाई सामने आई है। हैरानी की बात यह है कि पंचायत का मामला निपट जाने के बाद भी शिक्षा विभाग लगातार उसी का हवाला देकर प्रधानाचार्य नियुक्ति को टालता रहा, जबकि वास्तविकता में प्रधानाचार्य नियुक्ति का मामला आज तक अधर में लटका हुआ है।
यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब पंचायत जैसे बड़े और संवेदनशील मुद्दे पर समयबद्ध निर्णय हो सकता है, तो फिर शिक्षा जैसे मूलभूत विषय पर वर्षों तक चुप्पी क्यों बनी हुई है? इसका सीधा असर स्कूलों की कार्यप्रणाली, शिक्षकों की जवाबदेही और सबसे बढ़कर बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड के बच्चों का भविष्य आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता लापरवाही, अनदेखी और कमजोर शिक्षा व्यवस्था की ओर जाता है, जबकि दूसरा रास्ता सुधार, ईमानदारी और मजबूत भविष्य की ओर। फैसला आज लेना होगा, क्योंकि अगर आज चुप रहे, तो कल बहुत देर हो जाएगी।
यह केवल स्कूलों की समस्या नहीं है, यह पूरे समाज और राज्य के भविष्य का सवाल है। जब तक शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक उत्तराखंड का वास्तविक विकास अधूरा ही रहेगा।

